आइल बसंत सिवान -डॉ.एम.डी.सिंह

सहकल सरसों आम बउराइल महुआ तोड़त बा तान 

फुलाइल तीसी गोहूं झूमत लेआइल बसंत सिवान

रहिला फूलल केराय गदराइल 
बा उरुदी माटी में लथराइल
सियार सियारिन संग रहरि धइलस 
ऊंखि के गउवाँ सम्मन मडराइल

नवा पहिन के लुग्गा झुल्ला सगर भइलैं पेड़ उतान 
फुलाइल तीसी गोहूं झूमत लेआइल बसंत सिवान 

रहरि ठाढ़ि भइल लेइके छवना
हरेट्ठा बोरन खरहरा लवना
मरदा सहकल मउगी भुसनाइल 
गुदुरी कचरस के होई गवना

गुड़ महकल, खदकल जिउ लइका धाइ गइलैं कोल्हुआन 
फुलाइल तीसी गोहूं झूमत लेआइल बसंत सिवान 

ह बसंतपंचइया आजु ए भइया
त मिलिहैं सबके सुरसत्ती मइया
चन्दा जोगाड़ मूरत धरि के सभ
नचिहैं जोगाड़ी ता ता थइया 

सुरसत्ती माई दीहैं सबकरा के हिक भर गुन गियान
फुलाइल तीसी गोहूं झूमत लेआइल बसंत सिवान 

तान तोड़ना- अंगड़ाई लेना, रहिला-चना 
केराय- मटर, गदराइल- दानों से भर जाना
लुग्गा झुल्ला- अंगवस्त्रम, उतान-मस्त 
छवना- बच्चे, हरेट्ठा- अरहर के पौधे की लकड़ी
खरहरा- हरेट्ठे का झाड़ू , लवना -जलावन,
सहकल- उत्साहित होना,भुसनाना- मन ही मन कुछ कहना, जोगाड़ी - प्रबंधक

डॉ एम डी सिंह, पीरनगर, गाजीपुर (यू.पी.) में  पिछले पचास सालों से ग्रामीण क्षेत्रों में होमियोपैथी  की चिकत्सा कर रहे हैं