ठंड की रात - कविता

      ठंड की रात


कड़कती ठंड की रात थी,
हल्की हल्की बरसात थी।
हाथ में छतरी,ओढ़कर शाल
ओ आई थी।
ओ होंठ, ओ आंखें,ओ जुल्फें,
ओ जो मुस्कुराई थी।
जीवन के ओ पल भूल न पाऊं,
करूं तो क्या करूं।


ओ हो गई पराई,
मन मान लिया मेरी,
अब करूं तो क्या करूं।


जब से हुई जुदाई,
रात तन्हा तन्हा मेरी,
दिल में ओ रहती है,
पर आसमां से दूरी।
कैसे उसे पाऊं,
अब करूं तो क्या करूं।


मनाता हूं मन को
मानता नहीं,
देता हूं हवाला रस्मों
रिवाज़ का।
सुनता नहीं।
दिखाता हूं भय परिवार
समाज का।
फर्क पड़ता नहीं।
बगावत को है ऊतारु,
अब करुं तो क्या करूं।
                  - जुगेश चंद्र दास


Popular posts
महाकाल दर्शन हेतु महाकाल एप्प की लिंक एवं वेब साइट
Image
ऑटो पार्ट रिटेलर्स और वर्कशाप की दिक्कतें अब दूर हुईं; ऑटोमोबाइल सर्विस प्रोवाइडर गोमैकेनिक ने वापी में नया स्पेयर पार्ट्स फ्रैंचाइज़ी आउटलेट शुरू किया
Image
पियाजियो व्ही।कल्सऔ ने जयपुर में राजस्था न के अपनी तरह के पहले इलेक्ट्रिक व्हीजकल (ईवी) एक्सेपीरियेंस सेंटर का उद्घघाटन किया
Image
देश की एम्प्लॉयी फ्रेंडली कंपनी में शुमार हुआ पीआर 24x7; फीमेल स्टाफ के मासिक धर्म के लिए उठाया सार्थक कदम
Image
‘‘एक महिला को एक महिला से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता’’, यह कहना है एण्डटीवी के ‘संतोषी मां सुनाएं व्रत कथाएं’ की तन्वी डोगरा का
Image