बेटी धन

     रामकन्या गर्दन झुकाए गहरे विचारों में खोई हुई थी, उसके परिवार वाले गोल घेरा बनाए बैठे थे,क्योंकि बेटी सुमित्रा के विवाह के लिए, पास के गांव के सरपंच साहब के यहां से अपने बेटे गोविंद का रिश्ता आया था। घर के सभी सदस्य इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे थे। वह भी सोच रही थी, बेटी सुमित्रा के लिए इससे बेहतर और कोई वर नही हो सकताा, संपन्न परिवार का अच्छा ऊंचा पूरा युवक गोविंद उसकी सुंदर सी गृह कार्य में दक्ष बेटी के लिए सर्वथा उपयुक्त है।वह उसकी बेटी को सदा खुश रखेगा। अचानक उसकी तंद्रा भंग हुई, उसकी बड़ी ननद कमला कह रही थी, भैया तीन चार लाख से कम में हां मत करना। इस बात पर सभी अपनी सहमति दे रहे थे कि, सरपंच साहब के यहां क्या कमी है, वो अपने बेटे के लिए सुमित्रा जैसी कन्या पाने के लिए इतना धन तो दे ही सकते हैं।

 रामकन्या के कानों में यह बातें अंगारों की भांति प्रवेश कर रही थी उसे अपना अतीत आंखों के सामने आ नजर आ रहा था, उसका हाथ बरबस ही अपने सिर पर गया जहां उलझे हुए से कुछ बाल बचे थे, जिनमें उसकी उंगलियां उलझ गई। उसे हँसी आ गई, वह भी तो लंबे बालों वाली सुंदर कन्या थी ,सहेलियों के साथ हंसी ठिठौली करते हुए कब यौवन में प्रवेश कर गई और कब माता पिता को छोड़ सतरंगी सपने संजोए पिया के घर चली आई,पता ही नही चला। घर आंगन बुहारते बुहारते ससुराल वालों ने कब घर की दहलीज पार करा कर खेतों का रास्ता दिखला दिया उसे याद ही नही।गृहकार्य से निवृत्त हो रोज सर पर गोबर की टोकरी रख खेत पर उपले बनाना , दिन भर खेत में काम करना और शाम को चूल्हा जलाने के लिए सुखी लकड़ियां टोकरी में भर घर आना।यही दिनचर्या थी उसकी।टोकरी उठाते उठाते सर के बाल सफेद होकर झड़ने लगे थे। सुंदर चेहरा,आईने में बूढ़ा नज़र आने लगा था, पर पति देवता को उसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं थी,और वह इस परिवर्तन से अनजान अपने काम में मग्न थी।वह तो इसे ही अपना कर्तव्य समझ खुश थी ।

एक दिन की बात है, उपले बनाते बनाते अचानक खेत में काम करने वाली अन्य महिलाओं की बातें उसके कान में पड़ी,वे सब उसी को लेकर चर्चा कर रहीं थी "अरे ये राम कन्या तो विवाह हुआ जब बहुत सुंदर थी " लेकिन क्या करें रात दिन काम कर कर के देखो समय से पहले बूढ़ा गई है।पर क्यों इतना काम करती है? के जवाब में वह सुन रही थी "इसके पिता ने इसके विवाह में लड़के वालों से रुपयों की मांग की थी पर इसके ससुर के पास इतने रुपए नही थे वे इस रिश्ते को छोड़ना नहीं चाहते थे इसलिए अपने दो बीघा खेत को बेच कर रुपए जुटाए थे तब कहीं जाकर इसके पिता ने अपनी बेटी का विवाह किया था।

इसके बाद इसके ससुराल वालों की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय हो गई और इसी कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी इस सुंदर सी बहू को घर के कामों के अलावा खेती के कामों में झोंक दिया । जरा देखो ! कैसी बूढ़ा गई है?

उन महिलाओं की बातें सुनकर उसे होश आया था कि वह तो समाज की बनाई गई कुरीति का शिकार हो गई है जिसमें लड़की वाले लड़के वालों से विवाह के नाम पर सौदा करते हैं। वह तो अपने ससुर द्वारा उसके पिता को दी गई अपनी कीमत का बदला हाड़ तोड़ मेहनत करके चुका रही है,वह सिहर गई थी। 

 उसने देखा घरवाले भी इन्हीं चर्चा में व्यस्त थे। वह उठी उन लोगों के पास पहुंची और दृढ़ता से कह उठी , नही ! मैं अपनी फूल सी कोमल बच्ची को बंधुआ मजदूर नही बनने दूंगी। मै उसके सपनों को राख नही होने दूंगी, उसे असमय बूढ़ी नही होने दूंगी । मै अपनी बेटी को नही बेचूँगी।

उसकी आवाज सुन वातावरण में मौन पसर गया , घर वाले भौचक होकर उसकी ओर देखते रहे और एक एक कर सब अपनी गर्दन झुका वहां से बाहर निकल गए।

बेटी सुमित्रा जो वहीं आस पास ही अपनी उपस्थिति बनाए हुए थी,टकटकी लगाए अपनी मां को देखती रह गई कि उसकी मां को आज क्या हो गया ? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्यों उसके पिताजी बुआजी , काका काकी चुपचाप बाहर चले गए। राम कन्या ने अपनी बेटी को बाहों में भर लिया और एक गहरी सांस लेते हुए मुस्कुरा दी।

        - श्रीमती ज्ञानमाला शर्मा, लेखक/रचनाकार 

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