मातृदिवस पर आयोजित कार्यक्रम के अंतर्गत हुआ काव्य पाठ

जगत पूर्ण संसाधन है "माँ", दूर हुई तब अहसास हुआ


प्रदेश के युवाओं को साहित्य के क्षेत्र में बढ़कर-चढ़कर भाग लेना चाहिए। इसके लिये साहित्य अकेडमी मध्यप्रदेश, गाँव-गाँव तक कार्यक्रम आयोजित करा रहा है। साथ ही ऐसे लेखक जिनकी अभी तक एक भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है वह पांडुलिपि हमें भेज सकते है। उपरोक्त जानकारी साहित्य अकेडमी के निदेशक विकास दवे ने, संस्था स्वर्गीय रुक्मणि देवी राव वेलफेयर सोसायटी इंदौर द्वारा, मातृ दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित ऑनलाइन काव्य पाठ के अंतर्गत कही। उन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता भी की। कार्यक्रम के आयोजन अखिलेश राव ने किया और संचालन पंडित संतोष मिश्र 'राज' ने किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देवेन्द्र जोशी ने कहा कि आज के युवा व नया लेखन करने वालों को आगे आना चाहिए। कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में मुनींद्र दुबे ने भी शिरकत की। जिसमें उन्होंने कहा कि कविता आज के समय में व्यापार बन गई है। आज के समय में निराला, महावेदी, दिनकर जैसे कई महान साहित्यकारों को कम पढ़ा जाता है। साहित्य की समस्त विधाओं का सम्मान करना चाहिए। कार्यक्रम के आयोजक अखिलेश राव ने माँ के चरणों में "माँ जगत पूर्ण संसाधन है, माँ की छवि सुंदर और मनभावन है। 

मात्रा, अक्षर, रस छंद का संज्ञान नहीं, माँ पर लिखना आसान नहीं।" पंक्तियां निवेदित की।

माखन नगर से व्यंगकार जगदीश निर्मल ने "नेताजी का वृक्षारोपण कार्यक्रम पड़ा हुआ है खटाई में, क्योंकि अभी वे व्यस्त हैं,जंगलों की कटाई में..." पंक्ति के माध्यम से व्यंग्य कसा। गाज़ियाबाद से मित्रपाल सिसौदिया ने "कोई पूरा नहीं होता कोई आधा नहीं होता, असल में कोई दुनिया में कभी अपना नहीं होता" पंक्तियां पढ़ी।मध्यप्रदेश सागर जिले से अमोघ अग्रवाल ने हाइकु और कविता सुनाई जिसमें उन्होंने कहा "कहने को तो घर है मेरा, लगे खाली सा, तेरे बिन माँ।" गांधीनगर से पंकज जैन ने "फूल था पत्थरों पर चढ़ाया गया।" कविता सुनाई। भोपाल से विमल राव ने "सीने के खून पिलाती माँ" कविता पढ़ी।

इंदौर शहर से पं. संतोष मिश्र ने "समझ के भी ये समझते नहीं इशारों को, ये क्या हुआ है शहर के तमीज़दारों को" से ग़ज़ल की शुरुआत की। कौस्तुभ माहेश्वरी'हृदय' ने "नहीं अब शेष है जाना किसी तीरथ या मंदिर में 'हृदय' में माँ मेरी ममता की मूरत बन समाई है" रचना पढ़ी। सोनल पंजवानी ने "दिल में उठती हर तमन्ना अल्फ़ाज़ ढूँढती है," से आज़ाद नज़्म की शुरुआत की।

शिवानी गुप्ता ने "तुम कहते हो तुम्हें पसंद है" कविता सुनाई।। हास्य व्यंगकार महेंद्र कुमार सांघी ने मां को समर्पित करते हुए "आरजुएं इस दिल ने, बेइंतहां पाली थीं, पूरी हुई वहीं जिनमें, मां ने दुआएं डाली थी" कविता के बाद हास्य व्यंग्य के माध्यम से सभी को हंसाया। देपालपुर से श्रृंगार रस के कवि श्याम गोयल ने "तमाम उम्र तेरी चाहतों के नाम लिखूं, तुझे मैं गीत गजल या के माहताब लिखूं" शे'र से ग़ज़ल की शुरूआत की। कार्यक्रम के अंत में डॉ. पंकज जैन जी ने आभार व्यक्त किया।

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