मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना से बन्द पड़ी जिन्दगी को मिला ईंधन -महेश कुमार

  • "खुशियों की दास्तां" लॉकडाउन में ऐसा लगा था जैसे गाड़ी की तरह जिन्दगी भी बिगड़ गई, मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना से बन्द पड़ी जिन्दगी को मिला ईंधन -महेश कुमार



उज्जैन। बड़नगर तहसील के इंगोरिया में रहने वाले 42 वर्षीय महेश कुमार पेशे से मैकेनिक हैं। उनके परिवार में सात सदस्य हैं। महेश और उनके छोटे भाई दोनों बचपन से ही दुकान पर मैकेनिक का काम करते थे। अपने हुनर की बदौलत उन्होंने थोड़ा-बहुत रुपया जो कमाया था, उससे इंगोरिया चौपाटी पर एक गैरेज खोला था। चूंकि महेश बहुत अच्छे मैकेनिक हैं, इसीलिये आसपास के इलाकों में उनका काफी नाम होने लगा तथा ज्यादातर लोग अपने वाहनों में छोटी-मोटी दिक्कत आने पर अमूमन उन्हीं के गैरेज में ठीक करवाते थे।


लेकिन जैसे कई बार सिर मुंडाते ही ओले पड़ने की नौबत आ जाती है, बिलकुल वैसा ही कुछ महीने पहले महेश के साथ हुआ। जीवनभर की कमाई पूंजी गैरेज में लगाने के बाद कुछ समय तक तो गैरेज बहुत अच्छा चला, लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण अचानक हुए लॉकडाउन के कारण महेश का पूरा व्यवसाय ठप पड़ गया था। उन्होंने जितनी पूंजी गैरेज में लगाई थी, अब तक वे उसे वसूल भी नहीं कर पाये थे कि कोरोना संक्रमण के कारण हुए लॉकडाउन की अवधि लगातार बढ़ती जा रही थी। पैसों की कमी के कारण अब महेश को धीरे-धीरे घर चलाने में भी काफी दिक्कतें आने लग गई थी। घर का राशन खत्म होता जा रहा था और दूसरी तरफ लॉकडाउन की अवधि भी बढ़ती जा रही थी।


महेश को लगने लगा था कि उनकी जिन्दगी भी किसी गाड़ी की तरह ही अचानक खराब हो गई है। गाड़ियों को सुधारना तो महेश के बस की बात थी, लेकिन अचानक बिगड़ी जिन्दगी को कैसे सुधारा जाये और फिर दोबारा उसे कैसे चलाया जाये, यह महेश के समझ में नहीं आ रहा था। अनलॉक की प्रक्रिया प्रारम्भ होने के कई दिनों के बाद भी महेश का गैरेज पहले जैसा नहीं चल रहा था। उनकी आवक लगभग शून्य हो चुकी थी। दूसरी ओर राशन बाजार में काफी महंगा मिल रहा था, जिसे जुटा पाना महेश के बस की बात नहीं थी।


महेश ने समाचार-पत्र में मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना के बारे में जब पढ़ा तो उन्हें लगा कि यह योजना उनके लिये काफी मददगार साबित हो सकती है। बिना देर किये महेश ने योजना के तहत आवेदन और सभी आवश्यक दस्तावेज पंचायत के कार्यालय में जमा किये और कुछ समय बाद उन्हें पात्रता पर्ची वितरित कर दी गई तथा उनका राशन कार्ड भी बन गया। अब महेश और उनके पूरे परिवार को योजना के अनुसार पांच-पांच किलो गेहूं व चावल प्रति सदस्य, एक किलो नमक और डेढ़ लीटर केरोसीन प्रदाय किया जा रहा है। इस योजना ने रमेश की जिन्दगी की बन्द पड़ी गाड़ी को चलाने के लिये ईंधन का काम किया है। वे सदैव इसके लिये मुख्यमंत्री के आभारी रहेंगे।