योग और अहिंसा


ज 21 जून को सारा संसार योग दिवस के रूप में मना रहा है। योग अनन्तकाय कैनवस का एक जीवन्त कला है जो आनंद के रेखा चित्र को दो ब्रह्मांडो,एक जो हम सब के भीतर है, दूसरा वह जिसमें हम सब हैं मैं अद्भुत अंकन करता है। योग जीवन मूल्यों एवं शारीरिक प्रतिमानों को एक नई ऊंचाई प्रदान करता है। और आज जब संपूर्ण विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है एवं विश्व युद्ध द्वार पर खड़ा दिखाई पड़ रहा है तो मनुष्यता के लिए योग का महत्व कहीं और ज्यादा बढ़ गया है।

योग किसी कसरत का नाम अथवा किसी आसन में स्थापित हो जाना मात्र नहीं है। यह सब तो उसके प्रारंभिक पादान हैं जिन पर चढ़कर योगार्थ को कुछ आसानी से पाया जा सके। योग एक सहज संपूर्ण विज्ञान है जिसके माध्यम से शरीर मन और खगोल को एक साथ जोड़ा जाता है। यही नहीं यह दर्शनशास्त्र की अपार ऊर्जाओं को भी अपने भीतर प्रकल्पित कर एक ऐसे महाविद्या का प्रारूप प्रस्तुत करता है जिसकी शक्तियों का पूर्वनिर्धारण अत्यंत कठिन सा प्रतीत होता है। इसे सहज और सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाने हेतु भारतीय महर्षियों एवं मनीषियों ने अनेकानेक रास्ते सुझाए हैं। उनमे से महर्षि पतंजलि द्वारा सुझाए गए आठ चरणबद्ध तरीकों को योगसिद्धी प्राप्त करने की दिशा में प्रमुख साधन के रूप में देखा जाता है। एवं अष्टांग योग के नाम से जाना जाता है ।

अष्टांग योग के प्रथम खंड यम में द्वितीय उपखंड है अहिंसा। योग में अहिंसा का तात्पर्य क्या है? यदि हिंसा का अर्थ किसी को मारना है तो न कृष्ण योगीराज हो सकते थे न शिव, न कोई भी सैनिक एवं चाणक्य की गिनती भी इतिहास के बड़े आतताइयों में होती। फिर यहां हिंसा का अर्थ क्या है ? सहज उत्तर है यहां सत्य की अवमानना हिंसा है ,सत्य को न मानना हिंसा है, सत्य को मारना हिंसा है।

वर्तमान सत्य है , हम सत्य हैं, स्व सत्य है ,आपका आप सत्य है ,ऐसा हम यम के पहले चरण में ही जान चुके हैं। मन देह का स्वामी है, चेतना मन की, आत्मा चेतना की और आपका आप अथवा मैं आत्मा का स्वामी है ।वही परम ब्रह्म है, वही जीवात्मा है, वही होम्योपैथी द्वारा कहा जाने वाला वाइटल फोर्स है। इनमें से किसी पर आघात हिंसा है। 

यही बात कृष्ण ने युद्ध क्षेत्र में विचलित अर्जुन को बताने का प्रयास किया। लक्ष्य विरत हो रहे अर्जुन से आत्मरक्षा और आत्महत्या का अंतर समझाते हुए कृष्ण ने जब उन्हें आत्मावलोकन करवाया तब अर्जुन सहज ही हिंसा का अर्थ समझ पाए।जब नर्तक यह गाते हुए पास से गुज़रे कि 'वीणा के तारों को इतना न ऐंठो कि सुर ही टूट जाय,' कठिन तपस्या मे पीपल वृक्ष के नीचे बैठे सिद्धार्थ को स्व का बोध हुआ और महात्मा बुद्ध का जन्म । यही सत्यचेती योगमूलक स्वचेतना महात्मा गांधी में अहिंसा का बीज बोने में सफल हुई।

इन सबके सबसे बड़े साधक हैं भीष्म पितामह, जिनके शरीर को भी उनके चाहे बिना नहीं मारा जा सकता। योग शरीर, मन, चेतना, आत्मा और ब्रह्मांड इन पांचों को जोड़ने की यात्रा कथा है। जो देह से शुरू होकर परम ब्रह्म तक जाती है। लक्ष्य ही अमृत घटक है उसे पा लेना ही समाधि है ।

आग्रह अन्तरतम की प्रतिक्रियात्मक ऊर्जा है।सत्याग्रह और दुराग्रह इसके दो प्रकार हैं जो जीव नियामक केंद्र से उत्सर्जित हो कर आत्मा, चेतना और मन से होते हुए शरीर के सतह तक पहुंचते हैं। सत्याग्रह पूरी तरह सकारात्मक एवं अहिंसक ऊर्जा है और अपार शक्तिशाली है जो शरीर और मन दोनों को अपूर्व बल और चैतन्यता से ओतप्रोत कर देती है। वहीं दुराग्रह नकारात्मक ऊर्जा है जो शरीर और मन दोनों को रोगी और हिंसक बनाती है।

नकारात्मक ऊर्जा का विनाश हिंसा नहीं अपितु उसे अपने ऊपर आरोपित होने देना हिंसा है। यही बात योग में सरलता से समझाई गई है।

 

  -डॉ एम डी सिंह,  महाराज गंज