'प्यासा पंछी' - मुक्त छंद रचना

लॉक डॉउन में घर से 
बाहर निकल पड़ा
सोचा था कुछ आगे 
बढ़कर चल कर देखूं तो सही 
शहर का क्या हाल है।


मेरी तरह कोई क्या बेहाल है 
या सो रहा है कहीं किसी 
झोपड़पट्टी में चैन की नींद 
जबकि जानता हूं 
भूख में उसे 
कहां नींद आएगी 
सुबह से शाम 
मजदूरी करता था 
तो दो रोटी खा पाता था ।
काम बंद है मजदूरी 
उसके हाथ में नहीं 
तो भूख में उसे नींद 
आएगी कहां से ? 


वह तो उस 
जहाज का पंछी है
जिस पर सवार हो वह स्वप्न में
गहरे समुद्र में जा सकता है ।
लंबी- लंबी यात्रा कर सकता है 
पर अपने लिए नहीं सोच सकता,
क्योंकि जब वह अपने पेट के लिए नहीं
 सोच सकता तो वह अपने लिए क्या सोचेगा?


फुट ओवर ब्रिज पर टिन सेड के पीछे
मिल गया मुझे एक नौजवान 
फटे हाल उलझे हुए बाल 
उसके पेट की  अतडियां 
देख मैं डर गया
एक महीना पहले उसे
एक मकान पर 
उसे मजदूरी करते देखा था।
अब वह पहचान में नहीं आ रहा था।


मैंने उसका नाम पूछा।
उसने जवाब दिया।
लॉक डाउन
थोड़ी ही देर में वह पंछी उड़ गया,
सब कुछ इस धरती पर छोड़ छाड़ कर।



  • सुधीर सिंह सुधाकर, नई दिल्ली


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