75 वर्ष पुरानी बड़नगर की गोपाल गौशाला - 300 निराश्रित गायों का है आसरा

गौ-पालन, गौ-संरक्षण और गौ-संवर्धन की मिसाल है


जिले की सबसे बड़ी गौशाला का दर्जा प्राप्त है


      उज्जैन। गाय वैदिककाल से ही भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक रही है। वेदों में लिखा है कि जिस स्थान पर गाय सुखपूर्वक निवास करती है, वह स्थान तीर्थ बन जाता है। गौ-रक्षण, गौ-पालन और गौ-संवर्धन प्रारम्भ से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा है कि प्रदेश में निराश्रित गौवंश के पालन-पोषण और समुचित सुरक्षा दिये जाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने सभी जिलों में एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत गौशालाएं स्थापित करने का निर्णय लिया है।


      मध्य प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप गोपाल गौशाला गायों के संरक्षण, संवर्धन और पालन की एक मिसाल है। बड़नगर में स्थित यह गौशाला लगभग 75 वर्ष पुरानी है, जहां लगभग 300 निराश्रित गायों का संरक्षण और पालन-पोषण किया जाता है। साथ ही इसे उज्जैन जिले की सबसे बड़ी गौशाला का दर्जा भी प्राप्त है। गौशाला के अध्यक्ष डॉ.वासुदेव काबरा बताते हैं कि इस गौशाला की स्थापना सन 1945 में की गई थी। तब बड़नगर के नगर सेठ कनकमल और अन्य समाजसेवियों द्वारा इसका निर्माण और विकास किया गया था। डॉ.काबरा पिछले 20 सालों से गौशाला की देखरेख का कार्य कर रहे हैं। यह गौशाला पांच बीघा क्षेत्र में बनाई गई है।


      शहर की आपाधापी से दूर बनी गोपाल गौशाला के मुख्य द्वार से अन्दर जाते ही गोबर और गीली मिट्टी की सौंधी महक जहां मन से सुकून देती है, वहीं दूसरी ओर गायों का स्वच्छंद विचरण और रंभाते हुए अठखेलियां करते बछड़ों का दृश्य मन मोह लेता है। यहां आते ही एक पल के लिये तो ऐसा लगता है जैसे वृन्दावन में आ गये हों। सुबह जब गायों को चरने के लिये जंगल में ले जाया जाता है और शाम को जब गाय गोधूली बेला में अपने खुरों से धूल उड़ाती हुई एकसाथ जब गौशाला में आती हैं, तो मस्तिष्क पटल पर एकाएक श्रीकृष्ण और अन्य ग्वालबालाओं की छवि उभर जाती है।


      गायों के चारे को उगाने के लिये गौशाला के पास ही 20 बीघा जमीन है। डॉ.काबरा बताते हैं कि प्रतिवर्ष शासन के पशुपालन विभाग की तरफ से गौशाला को दो से तीन लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदाय की जाती है। गायों के पेयजल के लिये गौशाला में दो ट्यूबवेल है। पेयजल के लिये यहां केन्द्रीयकृत व्यवस्था की गई है। यहां पर मौसम के अनुसार गायों को आहार प्रदान किया जाता है। वर्तमान में सर्दियों के मौसम को ध्यान में रखते हुए गायों को चारे में अलसी का तेल, गेहूं की फाड़, सोयाबीन, मटर और गुड़ दिया जाता है। इसके अलावा सप्ताह में एक बार गायों को आहार में नमक भी दिया जाता है। गौशाला में अच्छी और उच्चवर्गीय गायों की नस्ल को तैयार करने के लिये समय-समय पर गिर और मालवा नस्ल की गायों की ब्रिडिंग करवाई जाती है।


      सुबह जब गाय जंगलों में चरने के लिये जाती है, तब पूरे गौशाला की साफ-सफाई की जाती है। गौशाला में गायों के ईलाज की भी समुचित व्यवस्था की गई है। इस गौशाला में गायों की अच्छी देखभाल का ही परिणाम है कि यहां गायों की प्राकृतिक मृत्यु दर अत्यन्त कम है। नगर निगम के अमले द्वारा लाई जाने वाली निराश्रित गायों के अलावा जो पशुपालक यहां अपनी पालतू गायों को छोड़ने के लिये आते हैं, उनकी पूरी जानकारी दस्तावेजों में बतौर रिकार्ड रखी जाती है।


      गौशाला में 15 लोगों का स्टाफ है, जो गायों की पूरी देखभाल करता है। गायों के लिये एक बड़ा शेड निर्माण किया गया है, जहां गर्मी दूर करने के लिये पंखे लगाये गये हैं, वहीं सर्दी और बारिश से गायों को बचाने के लिये बरसाती लगाई गई है।


      बात यदि गौ-संवर्धन की की जाये तो इसमें भी यह गौशाला अतुलनीय है। गौशाला के समीप शमशान घाट है, जहां अन्तिम संस्कार के लिये गायों के गोबर से बने कंडे अत्यन्त कम दरों पर दिये जाते हैं। इससे लकड़ी की भी बहुत बचत होती है तथा कई पेड़ कटने से बच जाते हैं। यहां गोबर से जैविक खाद का भी निर्माण किया जाता है। डॉ.काबरा ने बताया कि भविष्य में गोमूत्र से दवाएं बनाने का प्लांट लगाने तथा बायोगैस संयंत्र और सोलर ऊर्जा पैनल स्थापित करने की योजना है।


      गौशाला को एक साल में जैविक खाद से एक लाख 20 हजार रुपये और कंडों से एक लाख रुपये की आमदनी होती है। साल 2010 में ऑर्गेनिक फार्मिंग में बेहतरीन जैविक खाद उपलब्ध कराने के लिये इस गौशाला को विश्व बैंक द्वारा भी पुरस्कृत किया जा चुका है। वहीं 2018 में मध्य प्रदेश शासन की आचार्य विद्या सागर योजना के तहत गौशाला को दो लाख रुपये की नगद राशि बतौर पुरस्कार प्रदाय की गई है।


      गौशाला के सचिव श्री सत्यनारायण शर्मा कहते हैं कि सन 2000 में यहां मात्र 80 गाय थी। धीरे-धीरे इनकी संख्या में वृद्धि होती चली गई। उन्नत नस्ल के नये बछड़े गौशाला द्वारा किसानों और आदिवासियों को पालने के लिये दिये जाते हैं। इस प्रक्रिया की पहले औपचारिक कार्यवाही कागजों पर की जाती है। शासन की गोपाल पुरस्कार योजना का आयोजन भी समय-समय पर बड़े पैमाने पर इस गौशाला में किया जाता है। गौवंश की वृद्धि के लिये यहां छह उन्नत नस्ल के सांड हैं। शासन की ओर से सभी गायों को टैग लगाया जाता है।


      समिति के कोषाध्यक्ष श्री विष्णु कुमार पोरवाल बताते हैं कि प्रतिवर्ष दानदाताओं और दान पेटियों के माध्यम से गौशालाओं को लगभग 15 से 20 लाख रुपये की आमदनी होती है। साल में गोवर्धन पूजा और गोपाष्टमी के अवसर पर यहां विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। भूसे के भण्डारण के लिये यहां बड़ा शेड निर्माण कराया गया है। इसकी भण्डारण क्षमता तकरीबन 30 से 35 हजार टन है। गौशाला के पास निर्मित मुक्तिधाम का रख-रखाव और संचालन भी समिति द्वारा किया जाता है। प्रतिवर्ष यहां गरीब और लावारिस लाशों के दाह संस्कार की व्यवस्था पूर्णत: नि:शुल्क की जाती है।


      गौशाला के प्रबंधक श्री अशोक खुटवाल बताते हैं कि गौशाला के सभी सदस्य सुबह से लेकर शाम तक गोसेवा में लगे रहते हैं। इसके पीछे उनका उद्देश्य मात्र रुपये कमाना नहीं, बल्कि निश्चल भाव से गायों की सेवा करना है। गायों के साथ-साथ इस गौशाला में पक्षियों के लिये सतनाज की व्यवस्था भी प्रतिदिन की जाती है। हर रोज गौशाला की छत पर 30 से 40 किलो सतनाज (जवार, बाजरा, मक्का, चावल) डाला जाता है। कुछ ही देर में हजारों-लाखों की संख्या में पक्षी यहां दाना चुगने के लिये आते हैं। जब वे यहां एकसाथ इकट्ठे होते हैं तो उनकी कलरव से पूरा आकाश गूंज उठता है। निश्चित रूप से यह गौशाला सेवाभाव को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है।


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