हौसला...


बालकनी में खड़ी खड़ी अक्सर,
देखती हूँ, तेज रफ्तार गाड़ियों का,
 पीछा करती, सड़क पर बिखरी पड़ी धूल,
 पॉलीथिन की पन्नियाँ,कागज़ के टुकड़े।
मानो जिद्दी बच्चे की तरह उनके साथ होना चाहते है ,
उनकी बराबरी करना चाहते हैं।
यह सब मुझे रोमांचित करता है।
पर इनमें से कुछ दब जाते हैं, पीछे आने वाले वाहनों के पहियों तले।


कुछ थोड़ी दूर तक ही उड़ पाते हैं।
मै न जाने क्यों दुखी हो जाती हूँ ।
पर देखती हूँ ,कागज के कुछ टुकड़े ,
अपना हौसला नही खोते,
और बरबस किसी गाड़ी के पिछले हिस्से पर  लद जाते हैं।
मै आनन्दित हो जाती हूँ ,
उनकी इस सफलता पर ।
यह घटना रोज ही घटती है।
पर बात यह है कि मै दुःसाहस कर जाती हूँ,
इस घटना को, अभावग्रस्त, मुट्ठी भर आसमान वाले उन बच्चों से जोड़ने का।
जो स्ट्रीट लाइट की रोशनी को
अपने सपनों का दीपक बना,
कड़ी मेहनत से , उमंग के पंख लगा छूना चाहते है


उस आसमां को जो अनन्त है।
और अन्ततः छू लेते है ,
अपने हौसलों से वे ऊंचाइयां ।
और बटोर जाते हैं समाचार पत्रों की सुर्खियां,
और बन जाते है प्रेरणास्रोत ,
उन सब के लिए जो आसमान को छूना चाहते हैं। 
ऐसे सभी होनहार बच्चों को समर्पित ..
               -श्रीमती ज्ञानमाला शर्मा


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