चार पैसे क्या कमाना आ गया... - ग़ज़ल

ग़ज़ल


रिश्तों को यूँ आज़माना आ गया,
बीच दीवारें उठाना आ गया।


जो न थीं वो आदतें पैदा हुई,
आसमां सर पर उठाना आ गया।


उस समय ही ग़ैर के तुम क्यों हुए।
जब हमें पलकें बिछाना आ गया।


कुछ समझते ही नहीं इंसान को,
चार पैसे क्या कमाना आ गया।




  • बलजीत सिंह बेनाम, मोबा.9996266210
    संगीत अध्यापक, हाँसी-125033