गुनगुनी धूप - कविता

       गुनगुनी धूप


सुहानी लगने लगी सबको
गुनगुनी धूप।
कहर बरपा चली गई वर्षा
चुप चुप।
खुश हुई नीड़ से निकली
चिड़िया,
दाने,बच्चों के लिए चुग चुग।
दुबके लोग निकलने लगे
आंगन,
सेंकने लगे धूप चेहरे हैं
खुश खुश।
गलियों में चहल-पहल
सड़कों में भीड़,
रंग बिरंगे परिधान में
दिखने लगे रंग रुप।


                - जुगेश चंद्र दास